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18 अक्टूबर, 2013

"एक मदारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"एक मदारी"


देखो एक मदारी आया।
 अपने संग लाठी भी लाया।।

डम-डम डमरू बजा रहा है।
भालू, बन्दर नचा रहा है।।

म्बे काले बालों वाला।
भालू का अन्दाज निराला।।

खेल अनोखे दिखलाता है।
बच्चों के मन को भाता है।।
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वानर है कितना शैतान।
पकड़ रहा भालू के कान।।

यह अपनी धुन में ऐँठा है।
भालू के ऊपर बैठा है।।

लिए कटोरा पेट दिखाता।
माँग-माँग कर पैसे लाता।।

14 अक्टूबर, 2013

"गांधी टोपी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"गांधी टोपी"


गंजापन ढकने मेरीको टोपी, 

मेरे सिर पर रहती है।
ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , 

बार-बार यह कहती है।। 
  
देखो अपनी गाँधी टोपी, 
सारे जग से न्यारी है।
आन-बान भारत की है ये, 

हमको लगती प्यारी है।।


लालबहादुर और जवाहर जी ने, 
इसको धार लिया।
भारत का सिंहासन इनको, 

टोपी ने उपहार दिया।।


टोपी पहिन सुभाषचन्द्र,
लाखों में पहचाना जाता।
टोपी वाले नेता का कद, 

ऊँचा है माना जाता।। 


खादी की टोपी, धोती, कुर्ते, 
की शान निराली है।  
बिना पढ़े ही ये पण्डित, 
का मान दिलाने वाली है।।  

टोपी पहन सलामी, 

अपने झण्डे को हम देते हैं। 
राष्ट्र हेतु मर-मिटने का प्रण, 
हम खुश होकर लेते है।।

11 अक्टूबर, 2013

"बालक की इच्छा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति 
नन्हें सुमन से
एक बालकविता
"बालक की इच्छा"
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।
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मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।।

मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,
वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।।

ममता की मूरत मम्मी-जी,
पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।।

सपनों में सबके ही,
सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।।

मुझको पाकर सबने पाली हैं,
नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।।

मुझको दो वरदान प्रभू!
मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।।  

07 अक्टूबर, 2013

"आयी रेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"आयी रेल"

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।
हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।

जब स्टेशन आ जाता है।
सिग्नल पर यह रुक जाता है।।
जब तक बत्ती लाल रहेगी।
इसकी जीरो चाल रहेगी।।
हरा रंग जब हो जाता है।
तब आगे को बढ़ जाता है।।

बच्चों को यह बहुत सुहाती।
नानी के घर तक ले जाती।।
छुक-छुक करती आती रेल।
आओ मिल कर खेलें खेल।।
धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

03 अक्टूबर, 2013

"कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"कौआ"

कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।
सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।
काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।
काला-कौआ होता मेहतर।।

29 सितंबर, 2013

"लड्डू सबके मन को भाते!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता

लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे,
नारंगी-से कितने सारे!

बच्चे इनको जमकर खाते,
लड्डू सबके मन को भाते!

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प्रांजल का भी मन ललचाया,
लेकिन उसने एक उठाया!

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अब प्राची ने मन में ठाना,
उसको हैं दो लड्डू खाना!

तुम भी खाओ, हम भी खाएँ,
लड्डू खाकर मौज़ मनाएँ!

25 सितंबर, 2013

"हमने झूला झूला" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"हमने झूला झूला"
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मानसून का मौसम आया,
तन से बहे पसीना!
भरी हुई है उमस हवा में,
जिसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती हमको,
भाती है ठण्डाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
हमने झूला झूला!
ठण्डी-ठण्डी हवा लगी तब,
मन खुशियों से फूला!! 

20 सितंबर, 2013

"अब पढ़ना मजबूरी है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"अब पढ़ना मजबूरी है"

खेल-कूद में रहे रात-दिन,
अब पढ़ना मजबूरी है।
सुस्ती - मस्ती छोड़,
परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।।

मात-पिता,विज्ञान,गणित है,
ध्यान इन्हीं का करना है।
हिन्दी की बिन्दी को,
माता के माथे पर धरना है।।

देव-तुल्य जो अन्य विषय है,
उनके भी सब काम करेगें।
कर लेंगेंउत्तीर्ण परीक्षा,
अपना ऊँचा नाम करेंगे।।

श्रम से साध्य सभी कुछ होता,
दादी हमें सिखाती है।
रवि की पहली किरण,
हमेशा नया सवेरा लाती है।।

16 सितंबर, 2013

"बालकविता-तरबूज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"तरबूज"
 
जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!

तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!!
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यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!

एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!
 
पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!!

कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!
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इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!!
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इसका गूदा लाल-लाल था!
ठण्डे रस का भरा माल था!!