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15 जुलाई, 2010

“नाच रहा जंगल में मोर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

देख-देख मन हुआ विभोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
चंचल-चपला चमक रही है,
बादल गरज रहा घनघोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
रूप सलोना देख मोरनी,
के मन में है हर्ष-हिलोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।


नीलकण्ठ का नृत्य हो रहा,
पुरवा मचा रही है शोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
रंग-बिरंगा और मनभावन,
कितना अच्छा लगता मोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।


इस गीत को स्वर दिया है! अर्चना चावजी ने!

7 टिप्‍पणियां:

  1. मनभावन कविता...आज कल के सावन में मोर जगह जगह दिख जाते है.

    आप की रचना 16 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

    जवाब देंहटाएं
  2. ओह बडी प्यारी रचना है साथ ही तस्वीरें भी मनभावन हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर कविता है तस्वीरों ने तो जान डाल दी है
    आशा

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर रचना...चित्र देख कर दृश्य साकार हो गया ...

    जवाब देंहटाएं

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