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10 दिसंबर, 2010

“लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)



लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे,
नारंगी-से कितने सारे!

बच्चे इनको जमकर खाते,
लड्डू सबके मन को भाते!

pranjal_laddu2

प्रांजल का भी मन ललचाया,
लेकिन उसने एक उठाया!

prachi_laddu

अब प्राची ने मन में ठाना,
उसको हैं दो लड्डू खाना!

तुम भी खाओ, हम भी खाएँ,
लड्डू खाकर मौज़ मनाएँ!

6 टिप्‍पणियां:

  1. लड्डू बहुत ही स्वादिष्ट हैं शाश्त्रीजी, बधाई डोमेन पर शिफ़्ट होने की.

    रामराम

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  2. वाह ..देख कर मुँह में पानी आ रहा है ...सुन्दर कविता

    जवाब देंहटाएं
  3. लड्डू देखकर तो मुंह में पानी आ गया....

    जवाब देंहटाएं

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