मेरी बालकृति
"नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता "स्कूल बस"
बस में जाने में
मुझको,
आनन्द बहुत आता है।
खिड़की के नजदीक
बैठना,
मुझको बहुत सुहाता
है।।
पहले मैं विद्यालय
में,
रिक्शा से आता-जाता
था।
रिक्शे-वाले की हालत
पर,
तरस मुझे आता था।।
लेकिन अब विद्यालय
में,
इक नयी-नवेली बस आयी।
पीले रंग वाली सुन्दर
सी,
गाड़ी बच्चों ने
पायी।।
आगे हैं दो काले टायर,
पीछे लगे चार चक्के।
बड़े जोर से हार्न
बजाती,
हो जाते हम
भौंचक्के।।
पढ़-लिख कर मैं
खोलूँगा,
छोटे बच्चों का
विद्यालय।
अलख जगाऊँगा शिक्षा
की,
पाऊँगा जीवन की लय।। |
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11 सितंबर, 2013
"स्कूल बस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
07 सितंबर, 2013
04 सितंबर, 2013
"भँवरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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गुन-गुन करता भँवरा आया।
कलियों फूलों पर मंडराया।। यह गुंजन करता उपवन में। गीत सुनाता है गुंजन में।। कितना काला इसका तन है। किन्तु बड़ा ही उजला मन है। जामुन जैसी शोभा न्यारी। खुशबू इसको लगती प्यारी।। यह फूलों का रस पीता है। मीठा रस पीकर जीता है।। |
31 अगस्त, 2013
"बहुत काम का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
![]() "बहुत काम का"
यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
बिल्ली का दुश्मन है भारी।।
बन्दर अगर इसे दिख जाता।
भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।
उछल-उछल कर दौड़ लगाता।
बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।
यह सीधा-सच्चा लगता है।
बच्चों को अच्छा लगता है।।
धवल दूध सा तन है सारा।
इसका नाम फिरंगी प्यारा।।
आँखें इसकी चमकीली हैं।
भूरी सी हैं और नीली हैं।।
जग जाता है यह आहट से।
साथ-साथ चल पड़ता झट से।।
प्यारा सा पिल्ला ले आना।
सुवह शाम इसको टहलाना।।
नौकर है यह बिना दाम का।
वफादार है बड़े काम का।।
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27 अगस्त, 2013
"मेरा कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
23 अगस्त, 2013
"मोबाइल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
19 अगस्त, 2013
"मेरी गइया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"मेरी गइया"
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मेरी गइया बहुत निराली।
सीधी-सादी, भोली-भाली।
सुबह हुई गइया रम्भाई,
मेरा दूध निकालो भाई।
हरी घास खाने को लाना,
उसमें भूसा नहीं मिलाना।
इसका बछड़ा बहुत सलोना,
प्यारा-सा वह एक खिलौना।
मैं जब गइया दुहने जाता,
वह "अम्माँ" कहकर चिल्लाता।
सारा दूध नहीं दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।
थोड़ा ही ले जाना भइया,
सीधी-सादी मेरी मइया।
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15 अगस्त, 2013
"चले देखने मेला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता"चले देखने मेला"
हाथी दादा सूँड उठाकर
चले देखने मेला!
![]() बंदर मामा साथ हो लिया
बनकर उनका चेला!
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चाट-पकौड़ी ख़ूब उड़ाई
देख चाट का ठेला!
बहुत मज़े से फिर दोनों ने
जमकर खाया केला!
फिर आपस में दोनों बोले,
अच्छा लगा बहुत मेला!
जंगल में सबको बतलाया,
देखा हमने मेला!
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11 अगस्त, 2013
"मेरा बस्ता कितना भारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"मेरा बस्ता कितना भारी"
![]() मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।
मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।
पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।
रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।
कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।
मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।
एक पुस्तिका पेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।
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कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।
इतने से चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।
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