मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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बालकविता
"लिखना-पढ़ना सिखला दो"
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भैया! मुझको भी,
लिखना-पढ़ना, सिखला दो।
क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,
गिनती भी बतला दो।।
पढ़ लिख कर मैं,
मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।
दुनिया भर में,
बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।
रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,
मैं भी उठा करूँगी।
पुस्तक लेकर पढ़ने में,
मैं संग में जुटा करूँगी।।
बस्ता लेकर विद्यालय में,
मुझको भी जाना है।
इण्टरवल में टिफन खोल कर,
खाना भी खाना है।।
छुट्टी में गुड़िया को,
ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।
उसके लिए पेंसिल और,
इक कापी भी लाऊँगी।।
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03 अप्रैल, 2014
"लिखना-पढ़ना सिखला दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
04 सितंबर, 2013
"भँवरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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गुन-गुन करता भँवरा आया।
कलियों फूलों पर मंडराया।। यह गुंजन करता उपवन में। गीत सुनाता है गुंजन में।। कितना काला इसका तन है। किन्तु बड़ा ही उजला मन है। जामुन जैसी शोभा न्यारी। खुशबू इसको लगती प्यारी।। यह फूलों का रस पीता है। मीठा रस पीकर जीता है।। |
15 अप्रैल, 2011
"खेतों में शहतूत लगाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
15 फ़रवरी, 2011
"काँव-काँवकर, चिल्लाया है कौआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का,
जोड़ा कितना प्यारा।
नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।
काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।
कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली,
इनका मन बहलाती।।
देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँवकर,
चिल्लाया है कौआ।।
10 फ़रवरी, 2011
"जीने का ये मर्म बताते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
31 जनवरी, 2011
"...हम मौज मनाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
01 जनवरी, 2011
"शुभ हो सबको यह नया साल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
खाने को मिलता रहे माल!
शुभ हो सबको यह नया साल!!
स्वस्थ रहें नर और नारी,
सन्तान रहें आज्ञाकारी,
कचरा नहीं बीने कोई बाल!
शुभ हो सबको यह नया साल!!
♥ अब देखिए आज के चित्र पर कविता ♥
छील पेंसिल को मैंने इस कागज पर चिपकाया है।
देखो मम्मी मैंने कितना सुन्दर चित्र बनाया है।।
हरे रंग से पौधे में पत्तियाँ बनाई।
लाल रंग से इसमें कलियाँ बहुत सजाई।।
छीलन को चिपकाकर मोहक फूल खिलाए।
मेरी चित्रकला सबका मन बहुत लुभाए।।
सुमनो से बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं होता।
इन्हें देखकर रोता बालक भी चुप होता।।
लिखना सदा सुलेख, मनोरम चित्र बनाना।
बैर-भाव को भूल सभी को मित्र बनाना।।
चित्रांकन-प्रांजल
29 दिसंबर, 2010
"मिक्की माउस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मिक्की माउस कितना अच्छा।
लगता है चूहे का बच्चा।।
कितना हँसमुख और सलोना।
यह लगता है एक खिलौना।।
इसकी सूरत सबसे न्यारी।
लीची जैसी आँखें प्यारी।।
तन का काला, मन का गोरा।
मुझको भाता है यह छोरा।।
बालचित्रकार-प्राञ्जल
27 नवंबर, 2010
"डस्टर कष्ट बहुत देता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
विद्यालय अच्छा लगता,
पर डस्टर कष्ट बहुत देता है।
पढ़ना तो अच्छा लगता,
पर लिखना कष्ट बहुत देता है।।
दीदी जी तो अच्छी लगतीं,
पर वो काम बहुत देती हैं।
छोटी से छोटी गल्ती पर,
डस्टर कई जमा देतीं हैं।।
कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है??

दीदी हम छोटे बच्चे हैं,
कुछ तो रहम दिखाओ ना।
डाँटो भी, फटकारो भी,
पर हमको मार लगाओ ना।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)
25 जून, 2010
“भोजन सदा खिलाना!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
23 फ़रवरी, 2010
‘‘मोबाइल फोन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
16 फ़रवरी, 2010
‘‘चिड़िया रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
| बच्चों अर्थात् नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित हैः यह “नाइस” ब्लॉग! |
चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर, मीठा राग सुनाती हो। आनन-फानन में उड़ करके, आसमान तक जाती हो।। मेरे अगर पंख होते तो, मैं भी नभ तक हो आता। पेड़ो के ऊपर जा करके, ताजे-मीठे फल खाता।। जब मन करता मैं उड़ कर के, नानी जी के घर जाता। आसमान में कलाबाजियाँ कर के, सबको दिखलाता।। सूरज उगने से पहले तुम, नित्य-प्रति उठ जाती हो। चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से , मुझको रोज जगाती हो।। तुम मुझको सन्देशा देती, रोज सवेरे उठा करो। अपनी पुस्तक को ले करके, पढ़ने में नित जुटा करो।। चिड़िया रानी बड़ी सयानी, कितनी मेहनत करती हो। एक-एक दाना बीन-बीन कर, पेट हमेशा भरती हो।। अपने कामों से मेहनत का, पथ हमको दिखलाती हो।। जीवन श्रम के लिए बना है, सीख यही सिखलाती हो। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
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