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09 मई, 2010

‘‘बगुला भगत’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।


अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।


धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।


मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।


बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।


पंख कभी यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।


मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।


इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

13 टिप्‍पणियां:

  1. धवल दूध सा उजला तन है।
    जिसमें बसता काला मन है।।



    बगुला भगत बनने वालों की पोल खोल दी आपने..बढ़िया सुंदर और मजेदार कविता...

    बधाई शास्त्री जी!!

    जवाब देंहटाएं
  2. मीनों के कुल का घाती है।
    नेता जी का यह नाती है।।

    बढ़िया व्यंग....

    बगुले की सारी विशेषताएं बताती हुई अच्छी रचना..

    जवाब देंहटाएं
  3. मदर्स डे की बधाई . आज ममा लोगों का दिन है, सो कोई शरारत नहीं केवल प्यार और प्यार !!

    ____________________________
    पाखी की दुनिया में 'मम्मी मेरी सबसे प्यारी' !

    जवाब देंहटाएं
  4. इसे देख धोखा मत खाना।
    यह ढोंगी है जाना-माना।।
    बहुत सुन्दर बाल गीत

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर बाल गीत.

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर
    http://nanhen deep.blogspot.com/
    http://adeshpankaj.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर
    http://nanhen deep.blogspot.com/
    http://adeshpankaj.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  8. सिफ़ बच्चों को ही नहीं बड़ों भी रचना पढ़ कर मजा आया। अति सुन्दर..........रचना|
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

    जवाब देंहटाएं

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