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11 जून, 2012

"अपनी ओर लुभाते आम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 
एक साल में आते आम।
सबके मन को भाते आम।।

जब वर्षा से आँगन भरता,
स्वाद बदलने को जी करता,
तब पेड़ों पर आते आम।
सबके मन को भाते आम।।

चटनी और अचार बनाओ,
पक जाने पर काटो-खाओ,
आम सभी के होते आम।
सबके मन को भाते आम।।

कच्चा सबसे खट्टा होता,
पक जाने पर मीठा होता,
लंगड़ा वो कहलाते आम।
सबके मन को भाते आम।।

बम्बइया की शान निराली,
खुशबू होती है मतवाली,
अपनी ओर लुभाते आम।
सबके मन को भाते आम।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. कविता पढते- पढ़ते ही आम का स्वाद मिल गया !!
    सरस मीठी कविता !!!
    आम का अचार हम्म्म्

    जवाब देंहटाएं
  2. आम ही आम मीठे आम सुन्दर आममयी रचना...

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति

    कल 13/06/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' छोटे बच्‍चों की बड़ी दुनिया ''

    जवाब देंहटाएं
  4. मीठे मीठे आम ...बहुत सुन्दर !

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर मीठी सी रचना...
    सुन्दर....

    जवाब देंहटाएं
  6. आम के रस ने खास बना दिया कविता को

    जवाब देंहटाएं
  7. बढ़िया प्रस्तुति ...आम की .,गुठलियों के दाम की,चटनी और अचार की ...

    जवाब देंहटाएं

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