एक साल में आते आम। सबके मन को भाते आम।। जब वर्षा से आँगन भरता, स्वाद बदलने को जी करता, तब पेड़ों पर आते आम। सबके मन को भाते आम।। चटनी और अचार बनाओ, पक जाने पर काटो-खाओ, आम सभी के होते आम। सबके मन को भाते आम।। कच्चा सबसे खट्टा होता, पक जाने पर मीठा होता, लंगड़ा वो कहलाते आम। सबके मन को भाते आम।। बम्बइया की शान निराली, खुशबू होती है मतवाली, अपनी ओर लुभाते आम। सबके मन को भाते आम।। |
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11 जून, 2012
"अपनी ओर लुभाते आम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
23 सितंबर, 2011
" बिजली कड़की पानी आया" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
उमड़-घुमड़ कर बादल आये।
घटाटोप अँधियारा लाये।।
काँव-काँव कौआ चिल्लाया।
लू-गरमी का हुआ सफाया।।
मोटी जल की बूँदें आईं।
आँधी-ओले संग में लाईं।।
धरती का सन्ताप मिटाया।
बिजली कड़की पानी आया।।
लगता है हमको अब ऐसा।
मई बना चौमासा जैसा।।

पेड़ों पर लीची हैं झूली।
बगिया में अमिया भी फूली।।

आम और लीची घर लाओ।
जमकर खाओ, मौज मनाओ।।
18 मई, 2011
"लू-गरमी का हुआ सफाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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