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01 अप्रैल, 2020

बालगीत "पूरी दुनिया में कोरोना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रोग अगर दिखलाई दे तो,
कभी न करना जादू-टोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

बाहर नहीं निकलना घर से,
घर में पूरा समय बिताओ।
हर घंटे हाथों को धोओ,
साफ-सफाई को अपनाओ।
अपनी पुस्तक को दोहराओ,
यह अनमोल समय मत खोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

शीतल पेय कभी मत पीना,
आइसक्रीम अभी मत खाना।
ताजा-ताजा भोजन खाओ,
नियम सुरक्षा के अपनाना।
दिनचर्या को करो नियम से,
जल्दी उठना, जल्दी सोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

अच्छी सीख बड़ों की मानो,
बे-मतलब की जिद मत करना।
सच्ची बातों को कहने में,
कभी किसी से तुम मत डरना।
सुमनों से मित्रता निभाना,
मन के मनके सदा पिरोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

27 अक्टूबर, 2018

बालकविता "सब बच्चों का प्यारा मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।

नभ में कैसा दमक रहा है।
चन्दा कितना चमक रहा है।।

कभी बड़ा छोटा हो जाता।
और कभी मोटा हो जाता।।

करवाचौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।

महिलायें छत पर जा करके।
आसमान तकतीं जी भरके।।

यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।

जब नभ में बादल छा जाता।
तब मयंक का पता न पाता।।

लुका-छिपी का खेल दिखाता।
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।

धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।

यह नभ से अमृत टपकाता।
सबको इसका रूप सुहाता।।

21 मार्च, 2018

विश्व कविता-दिवस "भूखी गइया कचरा चरती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विश्व कविता दिवस पर
प्रस्तुत है आज एक बाल कविता
सड़क  किनारे जो भी पाया,
पेट उसी से यह भरती है।
मोहनभोग समझकर,
भूखी गइया कचरा चरती है।। 
 
कैसे खाऊँ मैं कचरे को,
बछड़ा मइया से कहता है।
दूध सभी दुह लेता मालिक,
उदर मेरा भूखा रहता है।। 

भोजन की आशा में बछड़ा,
इधर-उधर को ताक रहा है।
कोई चारा लेकर आये,
दरवाजे को झाँक रहा है।।

हरी घास के लाले हैं तो,
भूसा मुझे खिलाओ भाई।
मेरे हिस्से की खा जाते,
तुम सारी ही दूध-मलाई।।

08 मार्च, 2017

बालगीत "होली का मौसम अब आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।
पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।
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गुझिया थाली में पसरी हैं,
पकवानों की महक भरी हैं, 
मठरी ने मन को ललचाया।
होली का मौसम अब आया।।
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बरफी की है शान निराली,
भरी हुई है पूरी थाली,
अम्मा जी ने इसे बनाया।
होली का मौसम अब आया।।
मम्मी बोली पहले खाओ,
उसके बाद खेलने जाओ,
सूरज ने मुखड़ा चमकाया।
होली का मौसम अब आया।

01 मार्च, 2017

बालकविता "झूम-झूमकर मच्छर आते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

झूम-झूमकर मच्छर आते।
कानों में गुञ्जार सुनाते।।

नाम ईश का जपते-जपते।
सुबह-शाम को खूब निकलते।।
 
बैठा एक हमारे सिर पर।
खून चूसता है जी भर कर।।

नहीं यह बिल्कुल भी डरता।
लाल रक्त से टंकी भरता।।
 
कैसे मीठी निंदिया आये?
मक्खी-मच्छर नहीं सतायें।

मच्छरदानी को अपनाओ।
चैन-अमन से सोते जाओ।।

21 फ़रवरी, 2017

बालकविता "खेतों में शहतूत उगाओ"


कितना सुन्दर और सजीला।
खट्टा-मीठा और रसीला।।

हरे-सफेद, बैंगनी-काले।
छोटे-लम्बे और निराले।।

शीतलता को देने वाले।
हैं शहतूत बहुत गुण वाले।।

पारा जब दिन का बढ़ जाता।
तब शहतूत बहुत मन भाता।
 
इसका वृक्ष बहुत उपयोगी।
ठण्डी छाया बहुत निरोगी।।

टहनी-डण्ठल सब हैं बढ़िया।
इनसे बनती हैं टोकरियाँ।।
  रेशम के कीड़ों का पालन।
निर्धन को देता है यह धन।।

आँगन-बगिया में उपजाओ।
खेतों में शहतूत उगाओ।।

20 फ़रवरी, 2017

बालकविता "बच्चों का संसार निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।

बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।

पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।

प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।

बच्चों से होती है माता।
ममता से है माँ का नाता।।

बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।

कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।

15 फ़रवरी, 2017

बालकविता "तीखी-मिर्च कभी मत खाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

तीखी-तीखी और चर्परी।
हरी मिर्च थाली में पसरी।।

तोते इसे प्यार से खाते।
मिर्च देखकर खुश हो जाते।।

सब्ज़ी का यह स्वाद बढ़ाती।
किन्तु पेट में जलन मचाती।।

जो ज्यादा मिर्ची खाते हैं।
सुबह-सुबह वो पछताते हैं।।

दूध-दही बल देने वाले।
रोग लगाते, मिर्च-मसाले।।

शाक-दाल को घर में लाना।
थोड़ी मिर्ची डाल पकाना।।

तीखी-मिर्च कभी मत खाओ। 
सदा सुखी जीवन अपनाओ।।

13 फ़रवरी, 2017

बालकविता "सबके प्यारे बन जाओगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मैं तुमको गुरगल कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कश सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी??


सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।

भोली-भाली चिड़ियों को तुम,
लड़कर मार भगाती हो।
प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी,
तुम बहुत सताती हो।।

मीठी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।

बैर-भाव को तजकर ही तो,
अच्छे तुम कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।

10 फ़रवरी, 2017

बालकविता "क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चित्रांकन - कु. प्राची
मम्मी देखो मेरी डॉल।
खेल रही है यह तो बॉल।।

पढ़ना-लिखना इसे न आता।
खेल-खेलना बहुत सुहाता।।

कॉपी-पुस्तक इसे दिलाना।
विद्यालय में नाम लिखाना।।

मैं गुड़िया को रोज सवेरे।
लाड़ लड़ाऊँगी बहुतेरे।।

विद्यालय में ले जाऊँगी।
क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी।।

06 फ़रवरी, 2017

बालकविता "काँव-काँव कर चिल्लाया है कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का, 
जोड़ा कितना प्यारा।

नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।

काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।

कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली, 
इनका मन बहलाती।।

देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँव कर,
चिल्लाया है कौआ।।

31 जनवरी, 2017

बालकविता "लगता एक तपस्वी जैसा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।

अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।

धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।

मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।

बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।

पंखों को यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।

मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।

इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।


27 जनवरी, 2017

बालगीत "प्रकाश का पुंज हमारा सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से, 
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
नही किसी से भेद-भाव ये बैर कभी रखता है, 
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
सबके लिए समानरूप से सुख की बारिश बरसाता है,
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो, 
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

24 जनवरी, 2017

बालकविता "क.ख.ग. लिखवाती हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो, 
हमको खूब लुभाती हैं। 
ये ही हमसे ए.बी.सी.डी., 
क.ख.ग. लिखवाती हैं।। 

रेखा-चित्र बनाना, 
इनके बिना असम्भव होता है।
कला बनाना भी तो, 
केवल इनसे सम्भव होता है।। 

गल्ती हो जाये तो,
लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।
गुणा-भाग करना चाहो तो,
बस्ते में से इसे निकालो।। 

छोटी हो या बड़ी क्लास,
ये काम सभी में आती है। 
इसे छीलते रहो कटर से, 
यह चलती ही जाती है।।
तख्ती,कलम,स्लेट का, 
तो इसने कर दिया सफाया है।
बदल गया है समय पुराना,
नया जमाना आया है।।