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15 अक्टूबर, 2010

“यह दशानन ज्ञानवान था।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

rawana_5जो है एक शीश को ढोता।
बुद्धिमान वह कितना होता।।  

यह दशानन ज्ञानवान था।
बलशाली था और महान था।।

यह था वेद-शास्त्र का ज्ञाता।
यम तक इससे था घबराता।।

पूजा इसका नित्य कार्य था।
यह दुनिया में श्रेष्ठ आर्य था।।

किन्तु दम्भ जब इसमें आया।
इसने नीच कर्म अपनाया।।

अनाचार अब यह करता था।
सारा जग इससे डरता था।।
rama
जब इतने आतंक मचाया।
काल राम तब बनकर आया।।

रूप धरा था वनचारी का।
अन्त किया अत्याचारी का।।

जो जग से आतंक मिटाता।
वो घर-घर में पूजा जाता।।

जो पापी को देता मार।
होती उसकी जय-जयकार।।

11 अक्टूबर, 2010

“भार उठाता, गधा कहाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कितना सारा भार उठाता।
लेकिन फिर भी गधा कहाता।।
farmer-donkey-1 रोज लाद कर अपने ऊपर,
कपड़ों के गट्ठर ले जाता।
वजन लादने वाले को भी,
तरस नही इस पर है आता।।
donkey -3जिनसे घर में चूल्हा जलता,
उन लकड़ी-कण्डों को लाता।
जिनसे पक्के भवन बने हैं,
यह उन ईंटों को पहुँचाता।।
donkey_11यह सीधा-सादा प्राणी है,
घूटा और घास को खाता।
जब ढेंचू-ढेंचू करता है,
तब मालिक है मार लगाता।।

भार उठाता, गधा कहाता।
फिर भी नही किसी को भाता।।
(चित्र गूगल छवि से साभार)

07 अक्टूबर, 2010

“वानर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

monkeycrop जंगल में कपीश का मन्दिर।
जिसमें पूजा करते बन्दर।।
monkey_2कभी यह ऊपर को बढ़ता।
डाल पकड़ पीपल पर चढ़ता।।
monkey_3ऊपर जाता, नीचे आता।
कभी न आलस इसे सताता।।


उछल-कूद वानर करता है।
बहुत कुलाँचे यह भरता है।।

01 अक्टूबर, 2010

“प्राची की कार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

करती हूँ मैं इसको प्यार।
यह देखो प्राची की कार।।


जब यह फर्राटे भरती है,
बिल्कुल शोर नही करती है,
सिर्फ घूमते चक्के चार। 
यह देखो प्राची की कार।।


जब छुट्टी का दिन आता है,
करना सफर हमें भाता है,
हम इससे जाते हरद्वार।
यह देखो प्राची की कार।।


गीत, गजल और भजन-कीर्तन,
सुनो मजे से, जब भी हो मन,
मंजिल यह कर देती पार।
यह देखो प्राची की कार।।

27 सितंबर, 2010

"मुर्गें की सीख:दीन दयाल शर्मा" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मुर्गा बोला नहीं जगाता
अब तुम जागो अपने आप।
कितनी घडियाँ और मोबाइल
रखते हो तुम अनाप-शनाप।

मैं भी जगता मोबाइल से
तुम्हें जगाना मुश्किल है
कब से जगा रहा हूँ तुमको
तू क्या मेरा मुवक्किल है।

समय पे सोना, समय पे जगना
जो भी करेगा समय पे काम
समय बड़ा बलवान जगत में
समय करेगा उसका नाम।

--------

दीन दयाल शर्मा (बाल साहित्यकार)

अध्यक्ष,
राजस्थान साहित्य परिषद्
हनुमानगढ़ संगम-335512
mob. 9414514666

22 सितंबर, 2010

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।


बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

3 टिप्पणियाँ:

M VERMA २२ सितम्बर २०१० ७:३३ अपराह्न

अति हर चीज की अच्छी नहीं होती है और अब तो वर्षा की अति हो चुकी है
सुन्दर् रचना

रावेंद्रकुमार रवि २२ सितम्बर २०१० ८:०६ अपराह्न

गीत अच्छा है,
लेकिन अब तो यही मन हो रहा है
कि बरखा रानी फिर से कुछ दिनों के लिए रूठ जाएँ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) २२ सितम्बर २०१० ८:२२ अपराह्न

इस बार की बारिश पर बिलकुल सटीक रचना ...अति हर चीज़ की बुरी होती है ..

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।


बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

17 सितंबर, 2010

“काला कागा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

crow_11jpgरंग-रूप है भूरा-काला।
लगता बिल्कुल भोला-भाला।।
housecrowjpgजब खतरे की आहट पाता।
काँव-काँव करके चिल्लाता।।
IMG_2031small Copyउड़ता पंख पसार गगन में।
पहुँचा बादल के आँगन में।।
crow2031JPGशीतल छाया मन को भायी।
नाप रहा नभ की ऊँचाई।।
चतुर बहुत है काला कागा।
किन्तु नही बन पाया राजा।।
पितृ-जनों का इससे नाता।
यह दुनिया को पाठ पढ़ाता।।
काक-चेष्टा जो अपनाता।
धोखा कभी नहीं वो पाता।

09 सितंबर, 2010

“घोड़ा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

images (7)
मैं घोड़ा हूँ जानदार हूँ
स्वामीभक्त हूँ शानदार हूँ


खड़े-खड़े ही मैं सोता हूँ
कभी निराश नही होता हूँ 


ताकतवाला हिम्मतवाला
रणभूमि का हूँ मतवाला


युद्धक्षेत्र या कर्मक्षेत्र हो
अश्वमेध का धर्मक्षेत्र हो


इंजन हूँ मैं बिना भाप का
चेतक हूँ राणा प्रताप का
chetak

02 सितंबर, 2010

“गंगा-गइया बहुत महान” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

cow1 मेरी गइया सबसे न्यारी।
यह मुझको लगती है प्यारी।।


मम्मी इसको जब दिख जाती।
जोर-जोर से यह रम्भाती।।


मैं जब विद्यालय से आता।
अपनी गइया को सहलाता।। 
PRANJAL_COWतब यह गर्दन करती ऊपर।
रखने को मेरे काँधे पर।।


भोली-भाली इसकी सूरत।
ममता की यह लगती मूरत।।
images (6) गंगा-गइया बहुत महान।
ये हैं भारत की पहचान।।


स्वर्ग हमें धरती पर लाना।
इसीलिए है इन्हें बचाना।।

24 अगस्त, 2010

“रक्षाबन्धन की दिनचर्चा” (प्राची)


-मेरा आज का पावन दिन-
IMG_1913
मैं प्राची हूँ!
आज रक्षाबन्धन है! मैं अपनी सहेलियों के साथ मन्दिर में आयी हूँ! इसके बाद मैं अपने भाई प्रांजल,  विनीत चाचाजी तथा अपने प्यारे पापा नितिन शास्त्री को राखी बाँधूँगी!
तो साथियों यह है मेरे भइया प्रांजल शास्त्री-
DSC_0004 DSC_0007अब मैं अपने प्यारे चाचाजी को राखी बाँधूँगी-
DSC_0015DSC_0017 और अब मैं अपने पापा जी को
राखी बाँधने जा रही हूँ-

DSC_0020DSC_0021 आज मेरी दादी जी और बड़ी दादी जी
मेरे लिए छोले भटूरे बनाने की तैयारी कर रहीं है-

DSC_0022 और अब मैं और भइया चाचा के साथ 
बाजार घूमने जा रहे हैं।

DSC_0024 यह थी आपकी प्यारी प्राची की
राखी के दिन की दिनचर्चा!

17 अगस्त, 2010

"कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।

बस्ते का अब भार घटा दो।।

थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए।

हमको मन में चैन चाहिए।।

कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।

हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

11 अगस्त, 2010

‘‘इण्टर-नेट’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

करता है हर बात उजागर। 
इण्टर-नेट ज्ञान का सागर।।

इससे मेल मुफ्त हो जाता।
दूर देश में बात कराता।।
कहती है प्यारी सी मुनिया।
टेबिल पर है सारी दुनिया।।
लन्दन हो या हो अमरीका।
आबूधाबी या अफ्रीका।।
गली, शहर हर गाँव देख लो।
बादल, घूप और छाँव देख लो।।
उड़न-तश्तरी यह समीर की।
यह थाली है भरी खीर की।।
जग भर की जितनी हैं भाषा।
सबकी है इसमें परिभाषा।।
पल में नैनीताल घूम लो।
पर्वत की हर शिखर चूम लो।।
चाहे शोख नजारे देखो।
सजे-धजे गलियारे देखो।।
अन्तर्-जाल बड़े मनवाला।
कर देता है यह मतवाला।।


छोटा सा कम्प्यूटर लेलो। 
फिर इससे जी भरकर खेलो।।
आओ इण्टर-नेट पढ़ाएँ।
मौज मनाएँ, ज्ञान बढ़ाएँ।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

06 अगस्त, 2010

"नया राष्ट्र निर्माण करेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

हम भारत के भाग्य विधाता, नया राष्ट्र निर्माण करेंगे ।
निज-भारत के लिए निछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। 
गौतम, गाँधी, इन्दिरा जी की, हम ही तो तस्वीर हैं,
हम ही भावी कर्णधार हैं, हम भारत के वीर हैं,
भेद-भाव का भूत भगा कर, चारु राष्ट्र निर्माण करेंगे ।
देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।

चम्पा, गेन्दा, गुल-गुलाब ने, पुष्प-वाटिका महकाई,
हिन्द, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में भाई-भाई,
सब मिल-जुल कर आपस में, सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण करेगे ।
देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।
भगतसिंह, अशफाक -उल्ला की, आन न हम मिटने देगे,
धर्म-मजहब की खातिर अपनी ,शान न हम मिटने देंगे,
कौमी -एकता को अपना कर धवल -राष्ट्र निर्माण करेंगे ।
देश-प्रेम के लिए न्योछावर,हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।
दिशा-दिशा में, नगर-ग्राम में, बीज शान्ति के उपजायेंगे,
विश्व शान्ति की पहल करेंगे, राष्ट्र पताका लहरायेंगे,
भारत के सच्चे प्रहरी बन, स्वच्छ राष्ट्र निर्माण करेंगे ।
देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।