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15 अक्टूबर, 2010
11 अक्टूबर, 2010
“भार उठाता, गधा कहाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
07 अक्टूबर, 2010
“वानर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
01 अक्टूबर, 2010
“प्राची की कार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| करती हूँ मैं इसको प्यार। यह देखो प्राची की कार।। जब यह फर्राटे भरती है, बिल्कुल शोर नही करती है, सिर्फ घूमते चक्के चार। यह देखो प्राची की कार।। जब छुट्टी का दिन आता है, करना सफर हमें भाता है, हम इससे जाते हरद्वार। यह देखो प्राची की कार।। गीत, गजल और भजन-कीर्तन, सुनो मजे से, जब भी हो मन, मंजिल यह कर देती पार। यह देखो प्राची की कार।। |
27 सितंबर, 2010
"मुर्गें की सीख:दीन दयाल शर्मा" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मुर्गा बोला नहीं जगाता
अब तुम जागो अपने आप।
कितनी घडियाँ और मोबाइल
रखते हो तुम अनाप-शनाप।
मैं भी जगता मोबाइल से
तुम्हें जगाना मुश्किल है
कब से जगा रहा हूँ तुमको
तू क्या मेरा मुवक्किल है।
समय पे सोना, समय पे जगना
जो भी करेगा समय पे काम
समय बड़ा बलवान जगत में
समय करेगा उसका नाम।
--------
दीन दयाल शर्मा (बाल साहित्यकार)
अध्यक्ष,
राजस्थान साहित्य परिषद्
हनुमानगढ़ संगम-335512
mob. 9414514666
22 सितंबर, 2010
"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
अतिवृष्टि

जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।

बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।3 टिप्पणियाँ:
"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
अतिवृष्टि

जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।

बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।17 सितंबर, 2010
“काला कागा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
लगता बिल्कुल भोला-भाला।। काँव-काँव करके चिल्लाता।। पहुँचा बादल के आँगन में।। नाप रहा नभ की ऊँचाई।। चतुर बहुत है काला कागा। किन्तु नही बन पाया राजा।। पितृ-जनों का इससे नाता। यह दुनिया को पाठ पढ़ाता।। काक-चेष्टा जो अपनाता। धोखा कभी नहीं वो पाता। |
09 सितंबर, 2010
“घोड़ा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
02 सितंबर, 2010
“गंगा-गइया बहुत महान” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
24 अगस्त, 2010
“रक्षाबन्धन की दिनचर्चा” (प्राची)
17 अगस्त, 2010
"कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
कम्प्यूटर का युग अब आया।इसमें सारा ज्ञान समाया।। मोटी पोथी सभी हटा दो। बस्ते का अब भार घटा दो।। थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए। हमको मन में चैन चाहिए।। कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें। हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
11 अगस्त, 2010
‘‘इण्टर-नेट’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
इण्टर-नेट ज्ञान का सागर।। इससे मेल मुफ्त हो जाता। दूर देश में बात कराता।। ![]() कहती है प्यारी सी मुनिया। टेबिल पर है सारी दुनिया।। लन्दन हो या हो अमरीका। आबूधाबी या अफ्रीका।। ![]() बादल, घूप और छाँव देख लो।। उड़न-तश्तरी यह समीर की। यह थाली है भरी खीर की।। जग भर की जितनी हैं भाषा। सबकी है इसमें परिभाषा।। पल में नैनीताल घूम लो।पर्वत की हर शिखर चूम लो।। चाहे शोख नजारे देखो। सजे-धजे गलियारे देखो।। अन्तर्-जाल बड़े मनवाला। कर देता है यह मतवाला।। ![]() छोटा सा कम्प्यूटर लेलो। फिर इससे जी भरकर खेलो।। आओ इण्टर-नेट पढ़ाएँ। मौज मनाएँ, ज्ञान बढ़ाएँ।। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
06 अगस्त, 2010
"नया राष्ट्र निर्माण करेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| हम भारत के भाग्य विधाता, नया राष्ट्र निर्माण करेंगे । निज-भारत के लिए निछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। गौतम, गाँधी, इन्दिरा जी की, हम ही तो तस्वीर हैं, हम ही भावी कर्णधार हैं, हम भारत के वीर हैं, भेद-भाव का भूत भगा कर, चारु राष्ट्र निर्माण करेंगे । देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। चम्पा, गेन्दा, गुल-गुलाब ने, पुष्प-वाटिका महकाई, हिन्द, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में भाई-भाई, सब मिल-जुल कर आपस में, सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण करेगे । देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। भगतसिंह, अशफाक -उल्ला की, आन न हम मिटने देगे, धर्म-मजहब की खातिर अपनी ,शान न हम मिटने देंगे, कौमी -एकता को अपना कर धवल -राष्ट्र निर्माण करेंगे । देश-प्रेम के लिए न्योछावर,हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। दिशा-दिशा में, नगर-ग्राम में, बीज शान्ति के उपजायेंगे, विश्व शान्ति की पहल करेंगे, राष्ट्र पताका लहरायेंगे, भारत के सच्चे प्रहरी बन, स्वच्छ राष्ट्र निर्माण करेंगे । देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।। |
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अति हर चीज की अच्छी नहीं होती है और अब तो वर्षा की अति हो चुकी है
सुन्दर् रचना
गीत अच्छा है,
लेकिन अब तो यही मन हो रहा है
कि बरखा रानी फिर से कुछ दिनों के लिए रूठ जाएँ!
इस बार की बारिश पर बिलकुल सटीक रचना ...अति हर चीज़ की बुरी होती है ..