धूप और बारिश से,
जो हमको हैं सदा बचाते।
छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।
आसमान में जब घन छाते,
तब ये हाथों में हैं आते।
रंग-बिरंगे छाते ही तो,
हम बच्चों के मन को भाते।।
तभी अचानक आसमान से,

वेबकैम पर हिन्दी में प्रकाशित "पहली बाल रचना" वेबकैम की शान निराली। करता घर भर की रखवाली।। दूर देश में छवि पहुँचाता। यह जीवन्त बात करवाता।। आँखें खोलो या फिर मींचो। तरह-तरह की फोटो खींचो। कम्प्यूटर में इसे लगाओ। घर भर की वीडियो बनाओ।। चित्रों से मन को बहलाओ। खुद देखो सबको दिखलाओ।। छोटा सा है प्यारा सा है। बिल्कुल राजदुलारा सा है।। मँहगा नहीं बहुत सस्ता है। तस्वीरों का यह बस्ता है।। नवयुग की यह है पहचान। वेबकैम है बहुत महान।। |



![]() प्यारी-प्यारी गुड़िया जैसी, बिटिया तुम हो कितनी प्यारी। मोहक है मुस्कान तुम्हारी, घर भर की तुम राजदुलारी।। नये-नये परिधान पहनकर, सबको बहुत लुभाती हो। अपने मन का गाना सुनकर, ठुमके खूब लगाती हो।। निष्ठा तुम प्राची जैसी ही, चंचल-नटखट बच्ची हो। मन में मैल नहीं रखती हो, देवी जैसी सच्ची हो।। दिनभर के कामों से थककर, जब घर वापिस आता हूँ। तुमसे बातें करके सारे, कष्ट भूल मैं जाता हूँ।। मेरे घर-आगँन की तुम तो, नन्हीं कलिका हो सुरभित। हँसते-गाते देख तुम्हें, मन सबका हो जाता हर्षित।। |