"बन्दर की व्यथा"

बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
गली मुहल्लों और छतों पर,
खों-खों करके बहुत डराता।

कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।

लाठी और डुगडुगी लेकर,
इसे मदारी खूब नचाता।
यह करतब से हमें हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।
जंगल के आजाद जीव को,
मानव देखो बहुत सताता।
देख दुर्दशा इन जीवों की,
तरस हमें इन पर है आता।।
(चित्र गूगल छवि से साभार)











अति हर चीज की अच्छी नहीं होती है और अब तो वर्षा की अति हो चुकी है
सुन्दर् रचना
गीत अच्छा है,
लेकिन अब तो यही मन हो रहा है
कि बरखा रानी फिर से कुछ दिनों के लिए रूठ जाएँ!
इस बार की बारिश पर बिलकुल सटीक रचना ...अति हर चीज़ की बुरी होती है ..