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25 जून, 2014
20 जून, 2014
"गैस सिलेण्डर है वरदान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
![]()
एक बालकविता
"गैस सिलेण्डर है वरदान" ![]()
गैस सिलेण्डर कितना प्यारा।
मम्मी की आँखों का तारा।।
रेगूलेटर अच्छा लाना।
सही ढंग से इसे लगाना।।
गैस सिलेण्डर है वरदान।
यह रसोई-घर की है शान।।
दूघ पकाओ-चाय बनाओ।
मनचाहे पकवान बनाओ।।
बिजली अगर नहीं है घर में।
यह प्रकाश देता पल भर में।।
बाथरूम में इसे लगाओ।
गर्म-गर्म पानी को पाओ।।
बीत गया है वक्त पुराना।
अब आया है नया जमाना।।
कण्डे-लकड़ी अब मत लाना।
बड़ा सहज है गैस जलाना।।
किन्तु सुरक्षा को अपनाना।
इसे कार में नही लगाना।
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10 जून, 2014
"मेरा झूला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
![]()
एक बालकविता
"मेरा झूला"
![]()
मम्मी जी ने इसको डाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।
खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,
जब झूला पा जाती हूँ।
होम-वर्क पूरा करते ही,
मैं इस पर आ जाती हूँ।
करता है मन को मतवाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।
मुझको हँसता देख,
सभी खुश हो जाते हैं।
बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,
नये खिलौने लाते हैं।
आओ झूलो, मुन्नी-माला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।
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28 मई, 2014
"इसे मदारी खूब नचाता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
21 मई, 2014
"देखो एक मदारी आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
![]() एक बाल कविता "देखो एक मदारी आया" ![]() देखो एक मदारी आया। अपने संग लाठी भी लाया।। डम-डम डमरू बजा रहा है। भालू, बन्दर नचा रहा है।। लम्बे काले बालों वाला। भालू का अन्दाज निराला।। खेल अनोखे दिखलाता है। बच्चों के मन को भाता है।। वानर है कितना शैतान। पकड़ रहा भालू के कान।। यह अपनी धुन में ऐँठा है। भालू के ऊपर बैठा है।। लिए कटोरा पेट दिखाता। माँग-माँग कर पैसे लाता।। |
17 मई, 2014
"बिल्ली मौसी क्यों इतना गुस्सा खाती हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
![]() एक बाल कविता "बिल्ली मौसी क्यों इतना गुस्सा खाती हो" बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी, क्यों इतना गुस्सा खाती हो। कान खड़ेकर बिना वजह ही, रूप भयानक दिखलाती हो।। मैं गणेश जी का वाहन हूँ, मैं दुनिया में भाग्यवान हूँ।। चाल समझता हूँ सब तेरी, गुणी, चतुर और ज्ञानवान हूँ। छल और कपट भरा है मन में, धोखा क्यों जग को देती हो? मैं नही झाँसे में आऊँगा, आँख मूँद कर क्यों बैठी हो? |
09 मई, 2014
"खरबूजे का मौसम आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"खरबूजों का मौसम आया"
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11 अप्रैल, 2014
"कितना भारी मेरा बस्ता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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"मेरा बस्ता"
मेरा बस्ता कितना भारी। बोझ उठाना है लाचारी।। मेरा तो नन्हा सा मन है। छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।। पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक। थक जाता है मेरा मस्तक।। रोज-रोज विद्यालय जाना। बड़ा कठिन है भार उठाना।। ![]()
कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।। मोटी पोथी सभी हटा दो। बस्ते का अब भार घटा दो।। थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए। हमको मन में चैन चाहिए।। कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें। हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये। इतने से चल जाये काम। छोटा बस्ता हो आराम।। |
04 फ़रवरी, 2014
""बगुला भगत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
"बगुला भगत"
बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।
अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।
धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।
मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।
बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।
पंख कभी यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।
मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।
इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
![]()
"बगुला भगत"
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बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।
अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।
धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।
मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।
बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।
पंख कभी यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।
मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।
इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।
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