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23 अक्टूबर, 2011
14 अक्टूबर, 2011
"मकड़ी-मकड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों! आज प्रांजल-प्राची ने माँग रखी कि
बाबा जी मकड़ी पर लिखिए न!
उन्हीं की माँगपर प्रस्तुत है यह बालकविता!
उन्हीं की माँगपर प्रस्तुत है यह बालकविता!
कीट-पतंगे, मच्छर-मक्खी,
कच्चे जालों में जकड़े।
उनको ही तो कहती दुनिया,
आठ टाँग के मकड़ी-मकड़े।।
झाड़ी और दीवारों पर।
और दौड़ते रहते हैं ये,
इन महीन से तारों पर।।
कभी यह ऊपर को चढ़ते,
कभी फिसल नीचे आ जाते।
किन्तु निरन्तर कोशिश करते,
श्रम से कभी नहीं घबड़ाते।।
अपने पथ को निर्मित करते,
देखो इन यजमानों को।
करते रहते हैं ये प्रेरित,
जग में सब इन्सानों को।
एक बार हो गये विफल तो,
अगली बार सफल होंगे।
यदि होंगे मजबूत इरादे,
कभी नहीं असफल होंगे।।
12 अक्टूबर, 2011
"ककड़ी मोह रही सबका मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
नदी किनारे पालेजों में,
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
30 सितंबर, 2011
"दादी जियो हजारों साल" (प्रांजल-प्राची)
| हम बच्चों के जन्मदिवस को, धूम-धाम से आप मनातीं। रंग-बिरंगे गुब्बारों से, पूरे घर को आप सजातीं।। आज मिला हमको अवसर ये, हम भी तो कुछ कर दिखलाएँ। दादी जी के जन्मदिवस को, साथ हर्ष के आज मनाएँ।। अपने नन्हें हाथों से हम, तुमको देंगे कुछ उपहार। बदले में हम माँग रहे हैं, दादी से प्यार अपार।। अपने प्यार भरे आँचल से, दिया हमें है साज-सम्भाल। यही कामना हम बच्चों की दादी जियो हजारों साल।। |
23 सितंबर, 2011
" बिजली कड़की पानी आया" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
उमड़-घुमड़ कर बादल आये।
घटाटोप अँधियारा लाये।।
काँव-काँव कौआ चिल्लाया।
लू-गरमी का हुआ सफाया।।
मोटी जल की बूँदें आईं।
आँधी-ओले संग में लाईं।।
धरती का सन्ताप मिटाया।
बिजली कड़की पानी आया।।
लगता है हमको अब ऐसा।
मई बना चौमासा जैसा।।

पेड़ों पर लीची हैं झूली।
बगिया में अमिया भी फूली।।

आम और लीची घर लाओ।
जमकर खाओ, मौज मनाओ।।
19 सितंबर, 2011
"यह है अपना सच्चा भारत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
♥ यह है अपना सच्चा भारत ♥

सुन्दर-सुन्दर खेत हमारे।
बाग-बगीचे प्यारे-प्यारे।।
पर्वत की है छटा निराली।
चारों ओर बिछी हरियाली।।

सूरज किरणें फैलाता है।
छटा अनोखी बिखराता है।।
तम हट जाता, जग जगजाता।
जन दिनचर्या में लग जाता।।
चहक उठे हैं घर-चौबारे।
महक उठे कच्चे-गलियारे।।

गइया जंगल चरने जाती।
हरी घास मन को ललचाती।।
नहीं बनावट, नहीं प्रदूषण।
यहाँ सरलता है आभूषण।।

खड़ी हुई मजबूत इमारत।
यह है अपना सच्चा भारत।।
07 सितंबर, 2011
"रंग-बिरंगे छाते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
धूप और बारिश से,
जो हमको हैं सदा बचाते।
छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।
आसमान में जब घन छाते,
तब ये हाथों में हैं आते।
रंग-बिरंगे छाते ही तो,
हम बच्चों के मन को भाते।।
तभी अचानक आसमान से,
04 सितंबर, 2011
24 अगस्त, 2011
"थाली के बैंगन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गोल-गोल हैं, रंग बैंगनी,
बैंगन नाम हमारा है।
सुन्दर-सुन्दर रूप हमारा,
सबको लगता प्यारा है।।
कुछ होते हैं लम्बे-लम्बे,
कुछ होते हैं श्वेत-धवल।
कुछ होते हैं टेढ़े-मेढ़े,
कुछ होते हैं बहुत सरल।
सभी जगह पर थाली के
बैंगन ही बिकने आते है।
चापलूस लोगों से तो,
सब ही धोखा खा जाते हैं।
इनका भरता बना-बनाकर,
चटकारे ले-लेकर खाना।
किन्तु कभी अपने जीवन में,
खुदगर्ज़ों को मुँह न लगाना।।
बैंगन नाम हमारा है।
सुन्दर-सुन्दर रूप हमारा,
सबको लगता प्यारा है।।
कुछ होते हैं लम्बे-लम्बे,
कुछ होते हैं श्वेत-धवल।
कुछ होते हैं टेढ़े-मेढ़े,
कुछ होते हैं बहुत सरल।
सभी जगह पर थाली के
बैंगन ही बिकने आते है।
चापलूस लोगों से तो,
सब ही धोखा खा जाते हैं।
इनका भरता बना-बनाकर,
चटकारे ले-लेकर खाना।
किन्तु कभी अपने जीवन में,
खुदगर्ज़ों को मुँह न लगाना।।
(कुछ चित्र गूगल छवियों से साभार)
14 अगस्त, 2011
"अल्मौड़ा की बॉलमिठाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मेरे पापा गये हुए थे,
परसों नैनीताल।
मेरे लिए वहाँ से लाए,
वो यह मीठा माल।।
खोए से यह बनी हुई है,
जो टॉफी का स्वाद जगाती।
मीठी-मीठी बॉल लगी हैं,
खोए से यह बनी हुई है,
जो टॉफी का स्वाद जगाती।
मीठी-मीठी बॉल लगी हैं,
मुझको बहुत पसंद है आती।।
कभी पहाड़ों पर जाओ तो,
इसको भी ले आना भाई।
भूल न जाना खास चीज है,
अल्मौड़ा की बॉलमिठाई।।
कभी पहाड़ों पर जाओ तो,
इसको भी ले आना भाई।
भूल न जाना खास चीज है,
अल्मौड़ा की बॉलमिठाई।।
रक्षाबन्धन के अवसर पर,
यह मेरे भइया ने खाई।
उसके बाद बहुत खुश होकर,
मुझसे राखी भी बंधवाई।।
28 जुलाई, 2011
15 जुलाई, 2011
12 जुलाई, 2011
"प्लम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
गया आम का मौसम,
प्लम बाजारों में अब छाया।
इनको देख-देख कर देखो,
सबका मन ललचाया।।
लाल-लाल हैं जितने पोलम,
वो हैं खट्टे-मीठे,
लेकिन जो महरून रंग के,
वो लगते हैं मीठे,
पर्वत से शृंगार उतर कर,
मैदानों में आया।
अल्मौड़ा, चौखुटिया,
नैनीताल और चम्पावत,
प्लम के पेड़ों के बागीचे,
फैले हैं बहुतायत,
हरे-भरे इन वृक्षों ने है,
मन को बहुत लुभाया।
मार शीत की झेल-झेल,
शीतल फल हुए रसीले,
बारिश का पानी पीकर,
हो जाते नीले-पीले,
बच्चों और बड़ों ने इनको
बहुत चाव से खाया।
04 जुलाई, 2011
"मीठे होते आम डाल के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
आम पेड़ पर लटक रहे हैं।
पक जाने पर टपक रहे हैं।।
हरे वही हैं जो कच्चे हैं।
जो पीले हैं वो पक्के हैं।।
इनमें था जो सबसे तगड़ा।
उसे हाथ में मैंने पकड़ा।।
अपनी बगिया गदराई है
आमों की बहार आई है।
मीठे होते आम डाल के।
बासी होते आम पाल के।।
प्राची खुश होकर के बोली।
बाबा जी अब भर लो झोली।।
चूस रहे खुश होकर बच्चे।
आम डाल के लगते अच्छे।।
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