यह ब्लॉग खोजें

फ़ॉलोअर

02 मार्च, 2010

‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।


पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।


कीड़े और मकोड़े खाता।
सूखी रोटी भी खा जाता।।


सड़े मांस पर यह ललचाता।
काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।


साफ सफाई करता बेहतर।
काला-कौआ होता मेहतर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

9 टिप्‍पणियां:

  1. Man karta hai ki bachcha ho jaaun aur apni totlee jubaan se ye kavita sabko daud-daud ke sunaaun.. behatreen..
    Jai Hind...

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी अच्छी पोस्ट को पढकर अपनी एक पोस्ट याद हो आई। एक बेहतरीन कविता।

    जवाब देंहटाएं
  3. सजीव तस्वीर सुन्दर कविता। बहुत खूब बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. Acchhi rachna..

    aapki rachna me 2 line aur...

    कौए की दो आंखे काळी
    फिर भी वो तो काणा है
    काव काव कर के देखो
    सबके कान वो खाता है.

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।