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10 दिसंबर, 2010
06 दिसंबर, 2010
"कुकड़ूकूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रोज सवेरे मैं उठ जाता।
कुकड़ूकूँ की बाँग लगाता।।
कहता भोर हुई उठ जाओ।
सोने में मत समय गँवाओ।।
आलस छोड़ो, बिस्तर त्यागो।
मैं भी जागा, तुम भी जागो।।
पहले दिनचर्या निपटाओ।
फिर पढ़ने में ध्यान लगाओ।।
अगर सफलता को है पाना।
सेवा-भाव सदा अपनाना।।
मुर्गा हूँ मैं सिर्फ नाम का।
सेवक हूँ मैं बहुत काम का।।
02 दिसंबर, 2010
"मम्मी देखो मेरी रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
इंजन-डिब्बों का है मेल।
आओ आज बनाएँ रेल।।
इंजन चलता आगे-आगे,
पीछे-पीछे डिब्बे भागे,
सबको अच्छी लगती रेल।
आओ आज बनाएँ रेल।।
मैट्रो ट्रेन बनाई मैंने,
इसको बहुत सजाई मैंने,
मम्मी देखो मेरी रेल।
आओ आज बनाएँ रेल।।
कल विद्यालय में जाऊँगा,
दीदी जी को दिखलाऊँगा,
दो पटरी पर चलती रेल।
आओ आज बनाएँ रेल।।
27 नवंबर, 2010
"डस्टर कष्ट बहुत देता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
विद्यालय अच्छा लगता,
पर डस्टर कष्ट बहुत देता है।
पढ़ना तो अच्छा लगता,
पर लिखना कष्ट बहुत देता है।।
दीदी जी तो अच्छी लगतीं,
पर वो काम बहुत देती हैं।
छोटी से छोटी गल्ती पर,
डस्टर कई जमा देतीं हैं।।
कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है??

दीदी हम छोटे बच्चे हैं,
कुछ तो रहम दिखाओ ना।
डाँटो भी, फटकारो भी,
पर हमको मार लगाओ ना।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)
24 नवंबर, 2010
" नन्हे सुमन की आराधना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
इस ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
बेसुरे से राग में, अनुराग भर दो,
फँस गये हैं हम भँवर में, पार कर दो,
शारदे माँ कुमति हरकर सबको मेधावी बना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
वन्दना है आपसे, रसना में रस की धार दो,
हम निपट अज्ञानियों को मातु निज आधार दो,
माँ हमें वरदान दो, होवें सुफल सब साधना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
15 नवंबर, 2010
“गौमाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
07 नवंबर, 2010
“बिल्ली मौसी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
02 नवंबर, 2010
“टॉम-फिरंगी…चौकीदार हमारे!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे। दोनों चौकीदार हमारे।। हमको ये लगते हैं अच्छे। दोनों ही हैं सीधे-सच्चे।। यह हैं नित्य नियम से न्हाते। खुश होकर साबुन मलवाते।। बाँध चेन में इनको लाते। बाबा कंघी से सहलाते।। संगी-साथी ये घरभर के।। सुन्दर से हैं बहुत सलोने। दोनों ही हैं स्वयं खिलौने।। |
28 अक्टूबर, 2010
"खों-खों करके बहुत डराता।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
"बन्दर की व्यथा"

बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
गली मुहल्लों और छतों पर,
खों-खों करके बहुत डराता।

कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।

लाठी और डुगडुगी लेकर,
इसे मदारी खूब नचाता।
यह करतब से हमें हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।
जंगल के आजाद जीव को,
मानव देखो बहुत सताता।
देख दुर्दशा इन जीवों की,
तरस हमें इन पर है आता।।
(चित्र गूगल छवि से साभार)
26 अक्टूबर, 2010
“सेवों का मौसम है आया!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
22 अक्टूबर, 2010
“तोते उड़ते पंख पसार!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
15 अक्टूबर, 2010
“यह दशानन ज्ञानवान था।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
11 अक्टूबर, 2010
“भार उठाता, गधा कहाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
07 अक्टूबर, 2010
“वानर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
01 अक्टूबर, 2010
“प्राची की कार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| करती हूँ मैं इसको प्यार। यह देखो प्राची की कार।। जब यह फर्राटे भरती है, बिल्कुल शोर नही करती है, सिर्फ घूमते चक्के चार। यह देखो प्राची की कार।। जब छुट्टी का दिन आता है, करना सफर हमें भाता है, हम इससे जाते हरद्वार। यह देखो प्राची की कार।। गीत, गजल और भजन-कीर्तन, सुनो मजे से, जब भी हो मन, मंजिल यह कर देती पार। यह देखो प्राची की कार।। |
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