मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता "इण्टरनेट" करता है हर बात उजागर। इण्टर-नेट ज्ञान का सागर।। इससे मेल मुफ्त हो जाता। दूर देश में बात कराता।। कहती है प्यारी सी मुनिया।टेबिल पर है सारी दुनिया।। लन्दन हो या हो अमरीका। आबूधाबी या अफ्रीका।। ![]() बादल, घूप और छाँव देख लो।। उड़न-तश्तरी यह समीर की। यह थाली है भरी खीर की।। जग भर की जितनी हैं भाषा। सबकी है इसमें परिभाषा।। पल में नैनीताल घूम लो।पर्वत की हर शिखर चूम लो।। चाहे शोख नजारे देखो। सजे-धजे गलियारे देखो।। अन्तर्-जाल बड़े मनवाला। कर देता है यह मतवाला।। छोटा सा कम्प्यूटर लेलो। फिर इससे जी भरकर खेलो।। आओ इण्टर-नेट पढ़ाएँ। मौज मनाएँ, ज्ञान बढ़ाएँ।। |
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10 दिसंबर, 2013
"इण्टरनेट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
06 दिसंबर, 2013
"डस्टर कष्ट बहुत देता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता "डस्टर कष्ट बहुत देता है" खुद तो धूल भरा होता है, लेकिन सबकी धूल हटाता। ब्लैकबोर्ड पर लिखे हुए को, जल्दी-जल्दी यह मिटाता।। विद्यालय अच्छा लगता, पर डस्टर बहुत कष्ट देता है। पढ़ना तो अच्छा लगता, पर लिखना बहुत कष्ट देता है।। दीदी जी तो अच्छी लगतीं, पर वो काम बहुत देतीं हैं। छोटी सी गलती पर भी वो, जस्टर कई जमा देतीं हैं।। कोई तो उनसे ये पूछे, क्या डस्टर का काम यहीं है। कोमल हाथों पर चटकाना, क्या डस्टर का काम यही है।। ![]() दीदी हम छोटे बच्चे हैं, कुछ तो रहम दिखाओ ना। डाँटो भी-फटकारो भी, पर हमको मार लगाओ ना।। |
02 दिसंबर, 2013
"काला कागा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता "काला कागा" लगता बिल्कुल भोला-भाला।। काँव-काँव करके चिल्लाता।। पहुँचा बादल के आँगन में।। नाप रहा नभ की ऊँचाई।।
चतुर बहुत है काला कागा।
किन्तु नही बन पाया राजा।।
पितृ-जनों का इससे नाता।
यह दुनिया को पाठ पढ़ाता।।
धोखा कभी नहीं वो पाता। |
28 नवंबर, 2013
"यह है मेरी काली कार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता"यह है मेरी काली कार" यह है मेरी काली कार। करती हूँ मैं इसको प्यार।। जब यह फर्राटे भरती है, बिल्कुल शोर नही करती है, सिर्फ घूमते चक्के चार। करती हूँ मैं इसको प्यार।। जब छुट्टी का दिन आता है, करना सफर हमें भाता है, हम इससे जाते हरद्वार। करती हूँ मैं इसको प्यार।। गीत, गजल और भजन-कीर्तन, सुनो मजे से, जब भी हो मन, मंजिल यह कर देती पार। करती हूँ मैं इसको प्यार।। |
24 नवंबर, 2013
"सीधा प्राणी गधा कहाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
20 नवंबर, 2013
“तोते उड़ते पंख पसार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता "तोते उड़ते पंख पसार"
नीला नभ जिनका संसार।
वो उड़ते हैं पंख पसार।।
जब कोई भी थक जाता है।
वो डाली पर सुस्ताता है।।
तोता पेड़ों का बासिन्दा।
कहलाता आजाद परिन्दा।।
खाने का सामान धरा है।
पर मन में अवसाद भरा है।।
लोहे का हो या कंचन का।
बन्धन दोनों में तन मन का।।
अत्याचार कभी मत करना।
मत इसको पिंजडे में धरना।।
कारावास बहुत दुखदायी।
जेल नहीं होती सुखदायी।।
मत देना इसको अवसाद।
करना तोते को आज़ाद।।
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16 नवंबर, 2013
"वानर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बालकविता "वानर" ![]() जंगल में कपीश का मन्दिर। जिसमें पूजा करते बन्दर।। ![]() कभी यह ऊपर को बढ़ता। डाल पकड़ पीपल पर चढ़ता।। ![]() ऊपर जाता, नीचे आता। कभी न आलस इसे सताता।। उछल-कूद वानर करता है। बहुत कुलाँचे यह भरता है।। |
12 नवंबर, 2013
"सेबों का मौसम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
07 नवंबर, 2013
"खों-खों करके बहुत डराता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
03 नवंबर, 2013
"टॉम-फिरंगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बाल कविता "टॉम-फिरंगी"
टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे।
दोनों चौकीदार हमारे।।
हमको ये लगते हैं अच्छे।
दोनों ही हैं सीधे-सच्चे।।
![]()
जब हम इनको हैं नहलाते।
ये खुश हो साबुन मलवाते।।
बाँध चेन में इनको लाते।
बाबा कंघी से सहलाते।।
इन्हें नहीं कहना बाहर के।
संगी-साथी ये घरभर के।।
ये दोनों हैं बहुत सलोने।
सुन्दर से जीवन्त खिलौने।।
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30 अक्टूबर, 2013
"बिल्ली मौसी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बाल कविता "बिल्ली मौसी" बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी, क्यों इतना गुस्सा खाती हो। कान खड़ेकर बिना वजह ही, रूप भयानक दिखलाती हो।। मैं गणेश जी का वाहन हूँ, मैं दुनिया में भाग्यवान हूँ।। चाल समझता हूँ सब तेरी, गुणी, चतुर और ज्ञानवान हूँ। छल और कपट भरा है मन में, धोखा क्यों जग को देती हो? मैं नही झाँसे में आऊँगा, आँख मूँद कर क्यों बैठी हो? |
26 अक्टूबर, 2013
"काली गइया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
22 अक्टूबर, 2013
"पतंग का खेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति नन्हें सुमन से![]() एक बाल कविता "पतंग का खेल" ![]()
लाल और काले रंग वाली,
मेरी पतंग बड़ी मतवाली।
मैं जब विद्यालय से आता,
खाना खा झट छत पर जाता।
![]()
पतंग उड़ाना मुझको भाता,
बड़े चाव से पेंच लड़ाता।
पापा-मम्मी मुझे रोकते,
बात-बात पर मुझे टोकते।
लेकिन मैं था नहीं मानता,
नभ में अपनी पतंग तानता।
वही हुआ मन में जो डर था,
अब मैं काँप रहा थर-थर था।
मैं था यारों ऐसा हीरो,
सब विषयों लाया जीरो।
अब ये मैंने सोच लिया है,
पतंग उड़ाना छोड़ दिया है।
कभी नहीं अब हूँगा फेल,
नहीं करूँगा ज्यादा खेल।
आसमान में उड़ने वाली,
जो करती थी सैर निराली।
नहीं पतंग को प्यार करूँगा,
पढ़ने में अब ध्यान धरूँगा।
मित्रों! मेरी बात मान लो,
अपने मन में आज ठान लो।
पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।
कभी-कभी ही पतंग उड़ाओ।।
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