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28 अप्रैल, 2010

‘‘कूलर’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।
इसी लिए कूलर कहलाये।।

जब जाड़ा कम हो जाता है।
होली का मौसम आता है।।

फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।
यही हवाएँ लू कहलायें।।

तब यह बक्सा बड़े काम का।
सुख देता है परम धाम का।।

कूलर गर्मी हर लेता है।
कमरा ठण्डा कर देता है।।

चाहे घर हो या हो दफ्तर।
सजा हुआ है यह खिड़की पर।।

इसकी महिमा अपरम्पार।
यह ठण्डक का है भण्डार।।

जब आता है मास नवम्बर।
बन्द सभी हो जाते कूलर।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

25 अप्रैल, 2010

“महाकुम्भ-मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


महाकुम्भ-स्नान
हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।
नासिक के जागे हैं भाग।।

बहुत बड़ा यहाँ लगता मेला।
लोगों का आता है रेला।।
सुर-सरिता के पावन तट पर।
सभी लगाते डुबकी जी भर।।

बारह वर्ष बाद जो आता।
महाकुम्भ है वो कहलाता।। 

भक्त बहुत इसमें जाते हैं।
साधू-सन्यासी आते हैं।।
   जन-मन को हर्षाने वाला।
श्रद्धा का यह पर्व निराला।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार) 

21 अप्रैल, 2010

“बाल कविता:समीर लाल (उड़नतश्तरी)”

“गर्मी की छुट्टी”
-समीर लाल ’समीर’
गर्मी की छुट्टी

कर ली हमने खूब पढ़ाई
पढ़कर के आँखें खुजलाई
लिखी परीक्षा मेहनत कर के
तब गर्मी की छुट्टी आई.



अब होगा बस खेल तमाशा
सुबह शाम को धूम धमाका
सब बच्चे घर में खेलेंगे
धूप भला हम क्यूँ झेलेंगे..

पापा संग जा कुल्फी खाई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



दिन भर खूब कहानी पढ़ते
आपस में हम नहीं झगड़ते
कार्टून टी.वी. पर आया
बच्चों ने मन को बहलाया..

मौसी हमसे मिलने आई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



दीदी से कम्प्यूटर सीखा
हमें लगा वो स्वप्न सरीखा
पलक झपकते सब बतलाता
दुनिया भर की सैर कराता..

समय उड़ा बन हवा हवाई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



-समीर लाल ’समीर’

16 अप्रैल, 2010

“लैपटॉप” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“लैपटॉप”

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इस बस्ते में क्या है भइया,
हमें खोल कर दिखलाओ!
कहाँ चले तुम इसको लेकर,
कुछ हमको भी बतलाओ!! 

इसमें प्यारा लैपटॉप है,
छोटा सा है कम्प्यूटर!
नये जमाने का इसको ही,
हम तो कहते हैं ट्यूटर!!
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जो कुछ डेस्कटॉप में होता,
वही सभी कुछ है इसमें!
चाहे कहीं इसे ले जाओ,
यही खूबियाँ हैं इसमें!!

अगर घूमने जाओ पार्क में,
संग इसे भी ले जाओ!
रेल और बस में जाओ तो,
इससे इण्टरनेट चलाओ!!

गाना सुनने का यदि मन हो,
मनचाहा तुम गीत सुनो!
देशी और विदेशी चाहे,
कैसा भी संगीत सुनो!!

इसमें छोटा माउस-पैड है,
सुन्दर सा की-बोर्ड बना है!
यह खिलौना बहुत सलोना,
मुझको इससे प्यार घना है!!

14 अप्रैल, 2010

“नानी जी का घर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मई महीना आता है और,
जब गर्मी बढ़ जाती है।
नानी जी के घर की मुझको,
बेहद याद सताती है।।


तब मैं मम्मी से कहती हूँ,
नानी के घर जाना है।
नानी के प्यारे हाथों से,
आइसक्रीम भी  खाना है।।


कथा-कहानी मम्मी तुम तो,
मुझको नही सुनाती हो।
नानी जैसे मीठे स्वर में,
गीत कभी नही गाती हो।।


मेरी नानी मेरे संग में,
दिन भर खेल खेलतीं है।
मेरी नादानी-शैतानी,
हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।।


मास-दिवस गिनती हैं नानी,
आस लगाये रहती हैं।
प्राची-बिटिया को ले आओ,
वो नाना से कहती हैं।।

11 अप्रैल, 2010

“पेंसिल” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो,
हमको खूब लुभाती हैं।
ये ही हमसे ए.बी.सी.डी.,
क.ख.ग. लिखवाती हैं।।


रेखा-चित्र बनाना,
इनके बिना असम्भव होता है।
कला बनाना भी तो,
केवल इनसे सम्भव होता है।।


गल्ती हो जाये तो,
लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।
गुणा-भाग करना चाहो तो,
बस्ते में से इसे निकालो।।


छोटी हो या बड़ी क्लास,
ये काम सभी में आती है।
इसे छीलते रहो कटर से,
यह चलती ही जाती है।।


तख्ती,कलम,स्लेट का,
तो इसने कर दिया सफाया है।
बदल गया है समय पुराना,
नया जमाना आया है।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

06 अप्रैल, 2010

“बिन वेतन का चौकीदार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

“आज मैं अपने कुत्ते “टॉम” को

कंघी कर रहा था तो

सरस पायस के सम्पादक

श्री रावेंद्रकुमार रवि ने

इसके ये प्यारे-प्यारे चित्र

मेरे कैमरे में कैद कर ही दिये!”

और बन गयी
यह प्यारी सी बाल-कविता!
टॉम हमारा कितना अच्छा!
लगता है यह सीधा सच्चा!!
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ठण्डे जल से रोज नहाता!
फिर मुझसे कंघी करवाता!! 
IMG_1118 बड़े-बड़े हैं इसके बाल!
एक आँख है इसकी लाल!!
IMG_1116घर भर को है इससे प्यार!
प्राची करती इसे दुलार!!
बिन वेतन का चौकीदार!
सच्चा है यह पहरेदार!!

04 अप्रैल, 2010

‘‘हमारा सूरज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।


रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से,
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है,
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो,
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

02 अप्रैल, 2010

“पढ़ना-लिखना मजबूरी है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मुश्किल हैं विज्ञान, गणित,
हिन्दी ने बहुत सताया है।
अंग्रेजी की देख जटिलता,
मेरा मन घबराया है।।  


भूगोल और इतिहास मुझे,
बिल्कुल भी नही सुहाते हैं।
श्लोकों के कठिन अर्थ,
मुझको करने नही आते हैं।। 


देखी नही किताब उठाकर,
खेल-कूद में समय गँवाया,
अब सिर पर आ गई परीक्षा,
माथा मेरा चकराया।। 


बिना पढ़े ही मुझको,
सारे प्रश्नपत्र हल करने हैं।
किस्से और कहानी से ही,
कागज-कॉपी भरने हैं।।


नाहक अपना समय गँवाया,
मैं यह खूब मानता हूँ।
स्वाद शून्य का चखना होगा,
मैं यह खूब जानता हूँ।।


तन्दरुस्ती के लिए खेलना,
सबको बहुत जरूरी है।
किन्तु परीक्षा की खातिर,
पढ़ना-लिखना मजबूरी है।।

31 मार्च, 2010

‘‘भँवरा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


गुन-गुन करता भँवरा आया।
कलियों फूलों पर मंडराया।।


यह गुंजन करता उपवन में।
गीत सुनाता है गुंजन में।।


कितना काला इसका तन है।
किन्तु बड़ा ही उजला मन है।


जामुन जैसी शोभा न्यारी।
खुशबू इसको लगती प्यारी।।


यह फूलों का रस पीता है।
मीठा रस पीकर जीता है।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

28 मार्च, 2010

‘‘वफादार है बड़े काम का’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
बिल्ली का दुश्मन है भारी।।

बन्दर अगर इसे दिख जाता।
भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।

उछल-उछल कर दौड़ लगाता।
बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।

यह सीधा-सच्चा लगता है।
बच्चों को अच्छा लगता है।।

धवल दूध सा तन है सारा।
इसका नाम फिरंगी प्यारा।।

आँखें इसकी चमकीली हैं।
भूरी सी हैं और नीली हैं।।

जग जाता है यह आहट से।
साथ-साथ चल पड़ता झट से।।

प्यारा सा पिल्ला ले आना।
सुवह शाम इसको टहलाना।।

नौकर है यह बिना दाम का।
वफादार है बड़े काम का।।

26 मार्च, 2010

"सब्जी-मण्डी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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देखो-देखो सब्जी-मण्डी,
बिकते आलू,बैंगन,भिण्डी।
कच्चे केले, पक्के केले,
मटर, टमाटर के हैं ठेले।
गोभी,पालक,मिर्च हरी है,
धनिये से टोकरी भरी है।
लौकी, तोरी और परबल हैं,
पीले-पीले सीताफल हैं।
अचरज में है जनता सारी,
सब्जी-मण्डी कितनी प्यारी।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

24 मार्च, 2010

‘‘बस’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बस में जाने में मुझको,
आनन्द बहुत आता है।
खिड़की के नजदीक बैठना,
मुझको बहुत सुहाता है।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार) 
पहले मैं विद्यालय में,
रिक्शा से आता-जाता था।
रिक्शे-वाले की हालत पर,
तरस मुझे आता था।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)
लेकिन अब विद्यालय में,
इक नयी-नवेली बस आयी।
पीले रंग वाली सुन्दर सी,
गाड़ी बच्चों ने पायी।।


आगे हैं दो काले टायर,

पीछे लगे चार चक्के।
बड़े जोर से हार्न बजाती,
हो जाते हम भौंचक्के।।


पढ़-लिख कर मैं खोलूँगा,
छोटे बच्चों का विद्यालय।
अलख जगाऊँगा शिक्षा की,
पाऊँगा जीवन की लय।।

21 मार्च, 2010

"मेरा विद्यालय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


विद्या का भण्डार भरा है जिसमें सारा।
मुझको अपना विद्यालय लगता है प्यारा।।


नित्य नियम से विद्यालय में, मैं पढ़ने को जाता हूँ।
इण्टरवल जब हो जाता मैं टिफन खोल कर खाता हूँ।


खेल-खेल में दीदी जी विज्ञान गणित सिखलाती हैं।
हिन्दी और सामान्य-ज्ञान भी ढंग से हमें पढ़ाती हैं।।


कम्प्यूटर में सर जी हमको रोज लैब ले जाते है।
माउस और कर्सर का हमको सारा भेद बताते हैं।।


कम्प्यूटर में गेम खेलना सबसे ज्यादा भाता है।
इण्टरनेट चलाना भी मुझको थोड़ा सा आता है।।


जिनका घर है दूर वही बालक रिक्शा से आते हैं। 
जिनका घर है बहुत पास वो पैदल-पैदल जाते हैं।।


पढ़-लिख कर मैं अच्छे-अच्छे काम करूँगा।
दुनिया में अपने भारत का सबसे ऊँचा नाम करूँगा।

20 मार्च, 2010

‘‘टेली-विजन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरा टी0वी0 है अनमोल।
खोल रहा दुनिया की पोल।।


इसमें चैनल एक हजार।
इसके बिन जीवन बेकार।।


कितना प्यारा और सलोना।
बच्चों का ये एक खिलौना।।


समाचार इसमें हैं आते।
कार्टून हैं खूब हँसाते।।


गीत और संगीत सुनाता।
पल-पल की घटना बतलाता।।

बस रिमोट का बटन दबाओ।
मनचाहा चैनल पा जाओ।।



यह सबके मन को भाता है।
क्रि-केट, कुश्ती दिखलाता है।।


नृत्य सिखाता, मन बहलाता।
नये-नये पकवान बताता।।

नई-नई कारों को देखो।
जगमग त्योहारों को देखो।।

नये-नये देखो परिधान।
टेली-विजन बहुत महान।।
(रिमोट, कार और त्योहार के चित्र गूगल सर्च से साभार)

19 मार्च, 2010

‘‘रंग-बिरंगी तितली आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


तितली आई! तितली आई!!


रंग-बिरंगी, तितली आई।।



कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।


आँखों को लगते हैं प्यारे।।



फूलों पर खुश हो मँडलाती।


अपनी धुन में हो इठलाती।।



जब आती बरसात सुहानी।


पुरवा चलती है मस्तानी।।



तब तुम अपनी चाल दिखाती।


लहरा कर उड़ती बलखाती।।



पर जल्दी ही थक जाती हो।


दीवारों पर सुस्ताती हो।।



बच्चों के मन को भाती हो।


इसीलिए पकड़ी जाती हो।।



(चित्र गूगल सर्च से साभार)

18 मार्च, 2010

‘‘मेरा बस्ता कितना भारी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।


मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।


पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।


रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।

कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।


मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।


थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।


कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।


सस्ते में चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

17 मार्च, 2010

‘‘प्यारी प्राची’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
इतनी जल्दी क्या है बिटिया,
सिर पर पल्लू लाने की।
अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,
समय बिताने की।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,
मन ही मन हर्षाते हैं।
जब वो नन्ही सी बेटी की,
छवि आखों में पाते है।।


जब आयेगा समय सुहाना,
देंगे हम उपहार तुम्हें।
तन मन धन से सब सौगातें,
देंगे बारम्बार तुम्हें।।

दादी-बाबा की प्यारी,
तुम सबकी राजदुलारी हो।
घर आंगन की बगिया की,
तुम मनमोहक फुलवारी हो।।

सबकी आँखों में बसती हो,
इस घर की तुम दुनिया हो।
प्राची तुम हो बड़ी सलोनी,
इक प्यारी सी मुनिया हो।।

"मच्छर-दानी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जिसमें नींद चैन की आती।
वो मच्छर-दानी कहलाती।।

लाल-गुलाबी और हैं धानी।
नीली-पीली बड़ी सुहानी।।

छोटी, बड़ी और दरम्यानी।
कई तरह की मच्छर-दानी।।

इसको खोलो और लगाओ।
बिस्तर पर सुख से सो जाओ।।

जब ठण्डक कम हो जाती है।
गरमी और बारिश आती है।।

तब मच्छर हैं बहुत सताते।
भिन-भिन करके शोर मचाते।।

खून चूस कर दम लेते हैं।
डेंगू-फीवर कर देते हैं।।

मच्छर से छुटकारा पाओ।
मच्छरदानी को अपनाओ।।

16 मार्च, 2010

"कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मन को करता है मतवाला।
कम्प्यूटर है बहुत निराला।।


यह तो एक अनिवार्य भाग है।
कम्प्यूटर का यह दिमाग है।।
चलते इससे हैं प्रोग्राम।
सी.पी.यू.है इसका नाम।।

गतिविधियाँ सब दिखलाता है।
यह मॉनीटर कहलाता है।।
सुन्दर रंग हैं न्यारे-न्यारे।
आँखों को लगते हैं प्यारे।।

इसमें कुंजी बहुत समाई ।
टाइप इनसे करना भाई।।
सोच-सोच कर बटन दबाना।
हिन्दी-इंग्लिश लिखते जाना।।

यह चूहा है सिर्फ नाम का।
माउस होता बहुत काम का।।
यह कमाण्ड का ऑडीटर है।
इसके वश में कम्प्यूटर है।।

कविता लेख लिखो जी भर के।
तुरन्त छाप लो इस प्रिण्टर से।।


नवयुग का कहलाता ट्यूटर।
बहुत काम का है कम्प्यूटर।।