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17 जुलाई, 2013

"‘नन्हे सुमन’ में प्रकाशित रचनाओं का शुभारम्भ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मित्रों....!

   आज से नन्हे सुमन में प्रकाशित रचनाओं का शुभारम्भ इस पुस्तक की भूमिका से कर रहा हूँ।


      विगतवर्ष बाल कविताओं की मेरी प्रथम बालकृति 'नन्हे सुमन' के नाम से प्रकाशित हुई थी। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगिंग के पुरोधा आदरणीय समीर लाल 'समीर' भारत आये हुए थे। दूरभाष पर बातें हुईं और उन्होंने इस पुस्तक की भूमिका लिखने की सहर्ष स्वीकृति मुझे प्रदान कर दी। मैंने मेल से उन्हें 'नन्हे सुमन' की पाण्डुलिपि भेज दी और उन्होंने एक सप्ताह के भीतर इसकी भूमिका लिखकर मुझे मेल कर दी। मैं उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इस भूमिका को आपके साथ साझा कर रहा हूँ!
भूमिका
एक अद्भुत संसार - 'नन्हें सुमन'
            आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में जब हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल है। वह स्पर्धा के इस दौर में मात्र वही करना चाहता है जो उसे मुख्य धारा में आगे ले जाये, ऐसे वक्त में दुनिया भर के बच्चों के लिए मुख्य धारा से इतर कुछ स्रजन करना श्री रुपचन्द्र शास्त्री मयंक जैसे सहृदय कवियों को एक अलग पहचान देता है।

            ‘मयंक जी ने बच्चों के लिए रचित बाल रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ उनके ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन का बीड़ा उठाया है बल्कि उन्हें एक बेहतर एवं सफल जीवन के रहस्य और संदेश देकर एक जागरूक नागरिक बनाने का भी बखूबी प्रयास किया है।
            पुस्तक नन्हें सुमन अपने शीर्षक में ही सब कुछ कह जाती है कि यह नन्हें-मुन्नों के लिए रचित काव्य है। परन्तु जब इसकी रचनायें पढ़ी तो मैंने स्वयं भी उनका भरपूर आनन्द उठाया। बच्चों के लिए लिखी कविता के माध्यम से उन्होंने बड़ों को भी सीख दी है!
डस्टर बहुत कष्ट देता है’’ कविता का यह अंश बच्चों की कोमल पीड़ा को स्पष्ट परिलक्षित करता है-

‘‘कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है?’’

       ‘नन्हें सुमन में छपी हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण है और उनसे गुजरना एक सुखद अनुभव है। उनमें एक जागरूकता है, ज्ञान है, संदेश है और साथ ही साथ एक अनुभवी कवि की सकारात्मक सोच है.
    आराध्य माँ वीणापाणि की आराधना करते हुए कवि लिखता है-

‘‘तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
इस ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।’’

            मेरे दृष्टिकोण से तो यह एक संपूर्ण पुस्तक है जो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित करेगी। मुझे लगता है कि इसे न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी पढ़ना चाहिये।
            मेरा दावा है कि आप एक अद्भुत संसार सिमटा पायेंगे नन्हें सुमन में, बच्चों के लिए और उनके पालकों के लिए भी!
            कवि ‘‘मयंक’’ को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए मेरा साधुवाद, नमन एवं शुभकामनाएँ!

-समीर लाल समीर
http://udantashtari.blogspot.com/
36, Greenhalf Drive
Ajax, ON
Canada

06 मार्च, 2013

" प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कल मेरे पौत्र प्राञ्जल की 
14वीं वर्षगाँठ थी!

इस अवसर पर प्रिय प्राञ्जल को
दिल की गहराइयों से 
शुभकामनाएँ और आशीर्वाद!
--
रचा-बसा था उस समय, होली का त्यौहार।
पौत्ररत्न के रूप में, मिला हमें उपहार।।
--
जन्मदिवस पर आपको, देते हम आशीष।
पढ़-लिखकर बन जाइए, जल्दी से वागीश।।
रोज सुबह सन्देश आपका, जब हमको मिल जाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

जीवन कैसे जियेंयही सच्चे साथी सिखलाते हैं।
मर्म कर्म का हमेंहमारे शुभचिन्तक बतलाते हैं।
साथी पथ पर बढ़ने की जब सच्ची राह दिखाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

दूर देश से आयी तितलीसोई कली जनाने को,
उठो सवेरा हुआ-समेटो उगते हुए खज़ाने को,
कलिकाओं को सुमन बनाने कोभँवरा मंडराता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

बाँटो प्यार सभी कोये जीवन तो बहुत जरा सा है,
अमृत पाने कीसबके मन में होती अभिलाषा है,
लेकिन जिसने पिया गरलवो महादेव कहलाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

जब हम आते हैं   दुनिया मेंसभी बधायी देते हैं,
अनजानी सी मूरत मेंहम बचपन को पा लेते हैं,
खुशियों का परिवेशजगत में सबको बहुत सुहाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

01 जनवरी, 2013

" नया साल"


शुभ हो सबको यह नया साल!!
खाने को मिलता रहे माल!
स्वस्थ रहें नर और नारी,
सन्तान रहें आज्ञाकारी,
कचरा नहीं बीने कोई बाल!
शुभ हो सबको यह नया साल!!

♥ अब देखिए आज के चित्र पर कविता ♥

छील पेंसिल को मैंने इस कागज पर चिपकाया है।
देखो मम्मी मैंने कितना सुन्दर चित्र बनाया है।।

हरे रंग से पौधे में पत्तियाँ बनाई।
लाल रंग से इसमें कलियाँ बहुत सजाई।।

छीलन को चिपकाकर मोहक फूल खिलाए।
मेरी चित्रकला सबका मन बहुत लुभाए।।

सुमनो से बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं होता।
इन्हें देखकर रोता बालक भी चुप होता।।

लिखना सदा सुलेख, मनोरम चित्र बनाना।
बैर-भाव को भूल सभी को मित्र बनाना।।
चित्रांकन-प्रांजल

14 नवंबर, 2012

"चाचा नेहरू को नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को
शत्-शत् नमन!

जिस दिन लाल जवाहर ने था,
जन्म जगत में पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

मोती लाल पिता बैरिस्टर,
माता थी स्वरूप रानी।
छोड़ सभी आराम-ऐश को,
राह चुनी थी बेगानी।।
त्याग वकालत को नेहरू ने,
गांधी का पथ अपनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

आजादी पाने की खातिर,
वीरों ने बलिदान दिया।
अमर सपूतों ने पग-पग पर ,
अपमानों का पान किया।
दमन चक्र से जो गोरों के,
कभी नहीं घबराया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

दागे नहीं तोप से गोले,
ना बरछी तलवार उठायी।
सत्य-अहिंसा के बल पर,
खोई आजादी पायी।
अनशन करकेअंग्रेजों से,
शासन वापिस पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

बच्चों को जो सदा प्यार से,
हँसकर गले लगाता था।
इसीलिए तो लाल जवाहर,
चाचा जी कहलाता था
अपने जन्मदिवस को जिसने,
बालकदिवस बनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

शासक था स्वदेश का पहला,
अपना प्यारा चाचा।
नवभारत के निर्माता का,
मन था सीधा-साचा।
उद्योगों का जिसने,
चौबिस घंटे चक्र चलाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

10 नवंबर, 2012

“खों-खों करके बहुत डराता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दीपावली की शुभकामनाओं के साथ
एक बाल कविता
बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
बच्चों और बड़ों को भी ये,
खों-खों करके बहुत डराता।
 
कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।
 
गली-मुहल्ले, नगर गाँव में,
इसे मदारी खूब नचाता।
बच्चों को ये खूब हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।

 
कुनबे भर का पेट पालता,
लाठी से कितना घबराता।
तान डुगडुगी की सुन करके,
अपने करतब को दिखलाता।

25 अक्टूबर, 2012

"खेल-खेल में रेल चलायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खेल-खेल में रेल चलायें
(चित्र साभार-डॉ.प्रीत अरोरा)
आओ बच्चों  खेल सिखायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

इंजन राम बना है आगे,
उसके पीछे डिब्बे भागे,
दीदी हमको खेल खिलायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

साथ-साथ में हम गायेंगे,
सिगनल पर हम रुक जायेंगे,
अनुशासन का पाठ पढ़ायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

बड़े-बड़े हम काम करेंगे,
हम स्वदेश का नाम करेंगे,
पढ़-लिख कर ज्ञानी कहलायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।।

हम धरती माँ के सपूत हैं,
मानवता के अग्रदूत हैं,
विश्वगुरू फिर से बन जायें।
खेल-खेल में रेल चलायें।

09 जुलाई, 2012

"शादी आज बनाओगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
कहाँ चले ओ बन्दर मामा,
मामी जी को साथ लिए।
इतने सुन्दर वस्त्र आपको,
किसने हैं उपहार किये।।

हमको ये आभास हो रहा,
शादी आज बनाओगे।
मामी जी के साथकहीं
उपवन में मौज मनाओगे।।

दो बच्चे होते हैं अच्छे,
रीत यही अपनाना तुम।
महँगाई की मार बहुत है,
मत परिवार बढ़ाना तुम।

चना-चबेना खाकरअपनी
गुजर-बसर कर लेना तुम।
अपने दिल में प्यारे मामा,
धीरजता धर लेना तुम।।

छीन-झपटचोरी-जारी से,
सदा बचाना अपने को।
माल पराया पा करकेमत
रामनाम को जपना तुम।।

कभी इलैक्शन मत लड़ना,
संसद में मारा-मारी है।
वहाँ तुम्हारे कितने भाई,
बैठे भारी-भारी हैं।।

हनूमान के वंशज हो तुम,
ध्यान तुम्हारा हम धरते।
सुखी रहो मामा-मामी तुम,
यही कामना हम करते।।

11 जून, 2012

"अपनी ओर लुभाते आम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 
एक साल में आते आम।
सबके मन को भाते आम।।

जब वर्षा से आँगन भरता,
स्वाद बदलने को जी करता,
तब पेड़ों पर आते आम।
सबके मन को भाते आम।।

चटनी और अचार बनाओ,
पक जाने पर काटो-खाओ,
आम सभी के होते आम।
सबके मन को भाते आम।।

कच्चा सबसे खट्टा होता,
पक जाने पर मीठा होता,
लंगड़ा वो कहलाते आम।
सबके मन को भाते आम।।

बम्बइया की शान निराली,
खुशबू होती है मतवाली,
अपनी ओर लुभाते आम।
सबके मन को भाते आम।।

29 मई, 2012

"गर्म जलेबी हमें खिलाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पापा मेले में ले जाओ।
गर्म जलेबी हमें खिलाओ।।
गोल-गोल हैं प्यारी-प्यारी।
शानदार हैं सबसे न्यारी।।
नारंगी रंगों वाली हैं।
लगती कानों की बाली हैं।।
कितनी अच्छी, कितनी सुन्दर?
मीठा रस है इनके अन्दर।।
मेले में थोडी ही खाना।
बाकी अपने घर ले जाना।।
गर्म दूध में इन्हें डुबाना।
ठण्डी हो जाने पर खाना।।

28 अप्रैल, 2012

"सबका मन बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कभी झगड़ते हैं आपस में,
कभी दोस्त बन जाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

तन से चंचल, भोले-भाले,
नित्य दिखाते खेल निराले,
किस्से-कथा-कहानी में जो,
जिज्ञासा दिखलाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

कुत्ता-बिल्ली, गैया-बकरी,
चिड़िया अच्छी लगती है,
रोज नया कुछ करने की,
मन में अभिलाषा जगती है,
मीठी-मीठी बातों से ये,
सबका मन बहलाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

बच्चे घर की हैं फुलवारी,
बच्चों की है शान निराली,
जाति-पाति और छुआ-छूत ये,
कभी नहीं अपनाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

28 मार्च, 2012

"फूले नहीं समाये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मुक्त परीक्षा से होकर,
हम अपने घर में आये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।

लगा हुआ था काशीपुर में,
बाल सुन्दरी माँ का मेला।
बाबा-दादी ने दिखलाया.
वहाँ हमें सरकस का खेला।
जोकर की बातें सुनकर,
हम बहुत हँसे-मुस्काये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।


पहले गये खोखरे पर हम,
फिर आये माँ के दरबार।
अपना शीश नवाया हमने,
माँ की महिमा अपरम्पार।
भूख लगी तो बाबा जी ने,
चाट-पकौड़े खिलवाये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।

देहरादून हमारे पापा,
सरकारी सेवा करते हैं।
इसीलिए हम भी तो,
उनके साथ-साथ रहते हैं।
बहुत दिनों के बाद,
खटीमा के दर्शन कर पाये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।